nag-panchami
प्रकाशित कथा और उपलब्ध स्रोत संदर्भ।
स्रोत/प्रकाशन स्थिति को certification न समझें। कुलाचार और स्थानीय परंपरा परिवार/क्षेत्र के अनुसार बदल सकती है।
व्रत / पूजा कथा
महाभारत के आदिपर्व में राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के दंश से होने का प्रसंग आता है। उनके पुत्र जनमेजय ने प्रतिशोध में ऐसा सर्पसत्र आरंभ कराया जिसमें मंत्रबल से नाग अग्नि में खिंचे चले आते थे। यज्ञ का लक्ष्य केवल तक्षक नहीं रहा; पूरा नागवंश विनाश के संकट में आ गया।
इसी समय ऋषि जरत्कारु और नागकन्या जरत्कारु के पुत्र आस्तीक बड़े हुए। उनके जन्म का उद्देश्य दोनों कुलों के बीच सेतु बनना और नागवंश को विनाश से बचाना था। आस्तीक विद्वान, संयमी और मधुर वाणी वाले थे। वे यज्ञस्थल पहुंचे और पहले राजा तथा यज्ञ की विधि की प्रशंसा की, जिससे सभा ने उनकी बुद्धि और शिष्टता पहचानी।
राजा ने प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा। आस्तीक ने धन या पद न मांगकर सर्पसत्र रोकने की प्रार्थना की। सभा में मतभेद हुआ, क्योंकि तक्षक अभी अग्नि में नहीं गिरा था। आस्तीक ने समझाया कि अपराध का न्याय और पूरे जीव-समूह का विनाश अलग बातें हैं। प्रतिशोध यदि सीमा खो दे तो धर्म स्वयं अधर्म में बदल जाता है। जनमेजय ने वचन निभाया और यज्ञ रोक दिया।
नाग पंचमी पर इस कथा का अर्थ जीवित सर्पों से छेड़छाड़ या दूध पिलाना नहीं है। सर्प सामान्यतः दूध नहीं पीते और पकड़ने से मनुष्य तथा सर्प दोनों को हानि हो सकती है। प्रतीक, चित्र, मिट्टी की आकृति या सुरक्षित मंदिर-परंपरा से पूजा करें। घर में सर्प दिखे तो प्रशिक्षित वन्यजीव बचाव दल से संपर्क करें।
यह सामान्य धार्मिक मार्गदर्शिका है। परिवार, कुल और स्थानीय परंपरा में अंतर हो सकता है।
